कक्षा 10 नागरिक शास्त्र अध्याय 3 जाति, धर्म और लैंगिक मसले नोट्स 10वी के छात्रो के लिय बहुत ही महत्वपूर्ण अध्ययन समाग्री हैं। 10वी कक्षा एक बोर्ड कक्षा है अतः छात्रो को बहुत ही ध्यान से अध्ययन करना चाहिय। बोर्डस्टडि एक्सपेर्ट द्वारा बनाया गया यह नोट्स एनसीईआरटी के नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार तैयार किया गया हैं।
वैसे तो नागरिक शास्त्र एक रोचक विषय हैं लेकिन इसमे दिय गय तथ्यों को याद रखना कठिन हो सकता है। इसी समस्या को ध्यान मे रखते हुए हमने कक्षा 10 नागरिक शास्त्र अध्याय 3 जाति, धर्म और लैंगिक मसले नोट्स तैयार किया हैं। जिसके मदद से आप दिय गए अध्याय को अच्छे से समझ सकते हैं।
जाति, धर्म और लैंगिक मसले नोट्स
अध्याय 4: राजनीतिक दल
महत्वपूर्ण तथ्य
श्रम का लैंगिक विभाजन:- श्रम के विभाजन का वह तरीका जिसमें घर के अन्दर के समस्त कार्य परिवार की महिलाएँ करती हैं या अपनी देखरेख में घरेलू नौकरों अथवा नौकरानियों से करवाती है।
NOTE :- सामाजिक असमानता का कौन-सा रूप प्रत्येक स्थान पर दिखाई देता है – लैंगिक असमानता
लैंगिक विभाजन या भारत में लैंगिक विषमता:- लैंगिक विभाजन से आशय पुरुषों एंव महिलाओं के मध्य कार्य के विभाजन से है। कुछ कार्य विशेषकर घरेलू कार्य जैसे- खाना बनाना, सिलाई करना, कपड़े धोना एंव सफाई करना आदि केवल महिलाओं द्वारा किए जाते हैं। जबकि पुरुष कुछ विशेष प्रकार के कार्य करते हैं।
अधिकांश समाजों में इसे निम्न प्रकार से श्रम विभाजन से जोड़ा जाता है-
- पुरुषों एंव महिलाओं के मध्य लैंगिक विभाजन का यह अर्थ है कि पुरुष घरेलू कार्य नहीं कर सकते है। वे केवल इतना सोचते है। कि घरेलू कार्य करना महिलाओं का काम है। जब इन कार्यों हेतु पारिश्रमिक दिया जाता है तो पुरुष भी इन कार्यों को करने के लिए तैयार हो जाते है। उदाहरण के लिए अधिकांश दर्जी या होटलों में रसोइए पुरुष ही होते है।
- अधिकांश महिलाएँ घरेलू कार्यों के अतिरिक्त कुछ कार्य मजदूरी पर भी करती है। परन्तु उनके कार्यों की उचित मजदूरी प्रदान नहीं कि जाती है। न ही उचित महत्त्व दिया जाता है।
नारीवादी आन्दोलन:- वे आन्दोलन जिनका उदेश्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों एंव महिलाओं में समानता लाना है। विश्व के अलग-अलग भागों में महिलाओं ने अपने संगठन बनाये तथा बराबरी का अधिकार प्राप्त करने के लिए आन्दोलन किए। विभिन्न देशों में महिलाओं को वोट का अधिकार प्रदान करने के लिए आन्दोलन हुए महिला आन्दोलनों ने महिलाओं के व्यक्तिगत एंव पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग उठाई। इन आन्दोलनों को ही नारीवादी आन्दोलन कहा जाता है।
NOTE :- अधिकारों और अवसरों के मामलों में स्त्री और पुरुष की समानता मानने वाला व्यक्ति नारीवादी कहलाता है।
भारत में महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व:- भारत की विधायिका में महिलाओं का अनुपात बहुत कम है। उदाहरण के लिए लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या पहली बार 2009 में दस फीसदी को पार कर सकी। विभिन्न राज्यों की विधान सभाओं में महिला सदस्यों का अनुपात जनसंख्या में उनके अनुपात से बहुत कम है। राज्य की विधान सभाओं में उनका प्रतिनिधित्व 5 प्रतिशत से भी कम है। इस समस्या के समाधान का सबसे अच्छा तरीका यह है कि चुनावी निकायों में महिलाओं के समुचित अनुपात को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए।
पारिवारिक कानून:- विवाह, तलाक, गोद लेना एंव उत्तराधिकार जैसे परिवार से जुड़े मसलों से सम्बन्धित कानून को पारिवारिक कानून कहते है।